Shanivar Vrat Katha

शनिवार व्रत का महत्व

शनिदेव कर्मफल दाता हैं। वे मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। इसिलए उन्हें न्याय का देवता भी कहते हैं। जो व्यक्ति श्रद्धा और नियम से शनिवार का व्रत करता है, शनिदेव उस पर कृपा करते हैं और उनके जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

व्रत की विधि

  • शनिवार को प्रातः स्नान करें
  • काले वस्त्र पहनें
  • शनिदेव की मूर्ति या चित्र स्थापित करें
  • सरसों के तेल का दीपक जलाएं
  • काले तिल, उड़द, काला वस्त्र अर्पित करें
  • “ॐ शं शनैश्चराय नमः” मंत्र का जाप करें
  • दिन भर उपवास रखें या फलाहार करें
  • शाम को कथा सुनें/पढ़ें

शनिवार व्रत कथा

एक समय स्वर्गलोक में सभी नौ ग्रहों – सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु में विवाद हो `गया  कि हम सब में सबसे बड़ा कौन है?  इसका फैसला करने के लिए सभी नव ग्रह राजा इन्द्र के पास गए और बोले – हे देवराज! आज आपको यह फैसला करना होगा कि हममें से सबसे बड़ा कौन है?  यह सुनकर देवराज इन्द्र उलझन में पड़ गए। इसपर असमर्थता प्रकट करते हुए उन्होंने सभी नवग्रहों से कहा – इस समय पृथ्वी पर उज्जैन के राजा विक्रमादित्य सबसे सटीक न्याय करने वाले हैं, अतः आप उन्हीं के पास जाएं।

इंद्र के वचन सुनकर सभी ग्रह राजा विक्रमादित्य के दरबार में पहुंचे और राजा विक्रमादित्य से अपने प्रश्न का जवाब पूछा जिसको सुनकर राजा विक्रमादित्य भी कुछ देर के लिए उलझन में पड़ गए, कि मैं किसको छोटा या बड़ा बतलाऊ? जिसको छोटा कहूंगा वही क्रोध करेगा। क्योंकि सभी ग्रह अपनी-अपनी शक्तियों के कारण महान थे। किसी को भी छोटा या बड़ा बताना उनके लिए आसान नहीं था।

तभी राजा विक्रमादित्य के मन में एक उपाय आया और उन्होंने अलग-अलग धातुओं जैसे सोना, चांदी, कांसा, तांबा, सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक और लोहे के नौ आसन बनवाए। सबसे आगे सोना और सबसे पीछे लोहे के आसन को रखा गया। राजा ने सभी देवताओं को अपने-अपने आसन पर बैठने का आग्रह किया। राजा विक्रमादित्य ने कहा- आप सबमें जिसका आसन आगे होगा वह बड़ा और जिसका आसन पीछे होगा उसे छोटा जानिये।

चूंकि लोहे का आसन सबसे पीछे था, इसलिए शनिदेव समझ गए कि राजा ने मुझे सबसे छोटा बताया है। इस निर्णय से शनि देव कुपित होकर बोले- “हे राजन! तुमने मुझे सबसे छोटा बताकर मेरा अपमान किया है। तुम मेरी शक्तियों को नहीं जानते हो। सूर्य एक राशि में एक महीने, चन्द्रमा दो महीने दो दिन, मंगल डेढ़ महीने, बुध और शुक्र एक – एक महीने, बृहस्पति तेरह महीने, राहु और केतु दोनों उल्टे चलते हुए केवल 28 महीने एक राशि पर स्थित रहते हैं, लेकिन मैं किसी भी राशि पर ढ़ाई वर्ष से लेकर साढ़े सात वर्ष तक रहता हूं। बड़े-बड़े देवताओं को मैंने अपने कोप से पीड़ित किया है, श्री राम पर साढ़े साती आने पर वनवास हो गया, रावण पर साढ़े – साती आने पर श्री राम ने लंका पर चढ़ाई की और रावण को परास्त किया। अतः अब तू भी मेरे प्रकोप से सावधान रहना”। इसपर राजा विक्रमादित्य कहा – जो कुछ भाग्य में होगा देखा जाएगा।

कुछ समय बाद राजा विक्रमादित्य पर साढ़े साती की दशा आई, शनिदेव घोड़े के व्यापारी बनकर  बहुत से घोड़ों के साथ विक्रमादित्य के नगर में पहुंचे। जब राजा विक्रमादित्य को यह सूचना मिली तो उन्होंने अश्वपाल को अच्छे – अच्छे घोड़े खरीदने की आज्ञा दी। अश्वपाल घोड़ों की इतनी अच्छी नस्ल और कम मूल्य सुनकर चकित रह गया, और राजा को सूचित किया। राजा विक्रमादित्य उन घोड़ों को देखकर एक अच्छे-से घोड़े को अपनी सवारी के लिए चुनकर उस पर चढ़े। राजा जैसे ही उस घोड़े पर सवार हुए वह बिजली की तरह दौड़ पड़ा। तेजी से दौड़ता हुआ घोड़ा राजा को दूर एक जंगल में लेकर चला गया और फिर वहां राजा को गिराकर अदृश्य हो गया। राजा अपने नगर लौटने के लिए जंगल में भटकने लगा, लेकिन राजा को कोई रास्ता नहीं मिला। राजा को बहुत तेज भूख – प्यास लगी थी। जंगल में बहुत देर तक भटकते – भटकते राजा को एक ग्वाला दिखाई दिया। राजा ने उससे पानी मांगा। ग्वाले ने राजा को पानी पिलाया। पानी पीकर राजा ने उसे अपनी अंगूठी दे दी और उससे रास्ता पूछकर जंगल से निकलकर पास के नगर में चल दिए।

नगर में पहुंचकर राजा एक सेठ की दुकान पर बैठ गया और अपना परिचय देते हुए कहा कि मेरा नाम वीका है और मैं उज्जैन का रहने वाला हूँ । राजा के कुछ देर दुकान पर बैठने से सेठ की बहुत बिक्री हुई। सेठ, राजा को भाग्यवान पुरुष समझकर उसे अपने पर भोजन कराने के लिए ले गया। सेठ के घर में भोजन करते समय राजा ने देखा सोने का एक हार खूंटी पर लटका हुआ था। राजा अकेला छोड़कर सेठ कुछ देर के लिए बाहर चला गया। तभी राजा ने आश्चर्यजनक घटना देखी, खूंटी सोने के उस हार को निगल गई। सेठ ने जब हार गायब देखा तो उसने चोरी का संदेह राजा पर किया और अपने नौकरों से कहा कि इसे रस्सियों से बांधकर नगर के राजा के पास ले चलो। राजा ने विक्रमादित्य से हार के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि खूंटी ने हार को निगल लिया। इस पर राजा क्रोधित हो गया और आज्ञा दी कि चोरी के अपराध में इसके हाथ – पैर काटकर इसे अपाहिज किया जाये। सैनिकों ने राजा विक्रमादित्य के हाथ-पांव काट कर उन्हें सड़क पर छोड़ दिया।

कुछ दिन बाद एक तेली उन्हें उठाकर अपने घर ले गया और उसे कोल्हू पर बिठा दिया। वीका बना राजा विक्रमादित्य आवाज देकर बैलों को हांकता रहता। कुछ वर्षों के बाद शनि की साढ़े साती पूरी होने पर वर्षा ऋतु प्रारंभ हुई। एक रात विक्रमादित्य मेघ मल्हार गा रहा था, उसका गाना सुनकर उस नगर की राजकुमारी मनभावनी उस पर मोहित हो गयी और दासी से कहा की यह इतनी मधुर आवाज में कौन गा रहा है? दासी ने जाकर देखा  और रानी को बताया कि तेली के घर एक अपाहिज है उसके हाथ -पैर नहीं है, वह मल्हार राग गा रहा है। राजकुमारी ने सब कुछ जानते हुए उससे विवाह करने का निश्चय किया।

राजकुमारी ने अपने माता-पिता से जब यह बात कही तो वह हैरान रह गए। उन्होंने राजकुमारी को बहुत समझाया कि तुम्हारा विवाह किसी बड़े और सुन्दर राजा के साथ किया जाएगा। लेकिन राजकुमारी ने जिद नहीं छोड़ी और प्राण त्याग देने की बात कही। आखिरकार राजा-रानी ने विवश होकर अपंग विक्रमादित्य से राजकुमारी का विवाह कर दिया। विवाह के बाद राजा विक्रमादित्य और राजकुमारी तेली के घर में रहने लगे। एक रात स्वप्न में शनिदेव ने राजा से कहा- राजा तुमने मेरा कोप देख लिया? मुझे छोटा बताकर तुमने कितने कष्ट उठाये?  मैंने तुम्हें अपने अपमान का दंड दिया है। राजा ने क्षमा मांगी और कहा – कि हे शनिदेव! आपने जितना दुःख मुझे दिया है, अन्य किसी को न देना।

इसपर शनिदेव ने कहा- राजन, मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करता हूं। जो कोई स्त्री-पुरुष मेरी पूजा करेगा, कथा सुनेगा, जो नित्य ही मेरा ध्यान करेगा, चींटियों को आटा डालेगा, उसको मेरी दशा में कभी कोई दुःख नहीं होगा वह सभी प्रकार के कष्टों से मुक्त होता होगा और उसकी सब मनोकामना पूर्ण होंगी।

अगले दिन प्रातःकाल अगले दिन प्रातःकाल जब राजकुमारी की आँखे खुली तो राजा के हाथ – पैर देखकर आश्चर्य में पड़ गई , राजा ने अपनी पत्नी को बताया कि वह उज्जैन का राजा विक्रमादित्य है और शनिदेव के कोप का सारा वृतांत सुनाया। राजा के बारे में जानकार राजकुमारी अति प्रसन्न हुई और अपनी सखियों को इसके बारे में बताया।

इधर जब सेठ को इस बारे में पता चला तो वह राजा विक्रमादित्य के पास आकर चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगा। राजा विक्रमादित्य ने उसे क्षमा कर दिया, क्योंकि वह जानते थे कि यह सब तो शनिदेव के कोप के कारण हुआ था। सेठ ने राजा से पुनः अपने घर चलकर भोजन करने का आग्रह किया। राजा ने स्वीकार किया। भोजन करते समय वहां सबके सामने उसी खूंटी ने हार उगल दिया।

सेठ ने राजा विक्रमादित्य से कहा कि मेरी श्रीकंवरी नामक कन्या है, इसे आप ग्रहण करें आपकी अति कृपा होगी। राजा विक्रमादित्य ने उसका आग्रह स्वीकार किया। सेठ ने अपनी कन्या का विवाह राजा से कर दिया और बहुत से स्वर्ण आभूषण, धन आदि देकर राजा को विदा किया। राजा विक्रमादित्य राजकुमारी मनभावनी और सेठ की बेटी श्रीकंवरी के साथ अपने नगर वापस पहुंचे तो नगरवासियों ने हर्ष के साथ उनका स्वागत किया। अगले दिन राजा विक्रमादित्य ने पूरे राज्य में घोषणा कराई कि शनिदेव सब ग्रहों में सर्वश्रेष्ठ हैं और उनकी पूजा करने का आदेश दिया। जो कोई भी शनिदेव की इस कथा सुनता है, पढता या औरों को सुनाता है उसके सभी दुःख दूर हो जाते हैं और उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी होती है।

                                        बोलो शनि देव की जय !!!

शनि देव की आरती

जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।

सूर्य पुत्र प्रभु छाया महतारी॥

जय जय श्री शनि देव….

श्याम अंग वक्र-दृ‍ष्टि चतुर्भुजा धारी।

नी लाम्बर धार नाथ गज की असवारी॥

जय जय श्री शनि देव….

क्रीट मुकुट शीश राजित दिपत है लिलारी।

लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी॥

जय जय श्री शनि देव….

देव दनुज ऋषि मुनि सुमिरत नर नारी।

विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी॥

जय जय श्री शनि देव भक्तन हितकारी।।

Shukravar Vrat Katha

संतोषी माँ व्रत कथा एक बुढिया थी उसके सात बेटे थे. उनमे से छः कमाते थे और एक निकम्मा था.

Read More »

Shanivar Vrat Katha

शनिवार व्रत का महत्व शनिदेव कर्मफल दाता हैं। वे मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। इसिलए उन्हें

Read More »

4 thoughts on “Shanivar Vrat Katha”

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top